ढाडी कला पंजाब के इतिहास को दिशा देने वाली गौरवशाली कला है- कुलतार सिंह संधवां
Aug25,2026
| Sushil Kumar | Patiala
-भाषा विभाग पंजाब ने ज्ञानी सोहन सिंह सीतल स्मृति ढाडी समारोह करवाया
पटियाला, 25 अगस्त: (सुशील कुमार सिंधी)
भाषा विभाग पंजाब द्वारा यहां भाषा भवन में ज्ञानी सोहन सिंह सीतल स्मृति ढाडी समारोह करवाया गया। इस अवसर पर पंजाब विधानसभा के स्पीकर स. कुलतार सिंह संधवां ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करते हुए कहा कि ढाडी कला पंजाब के इतिहास को दिशा देने वाली गौरवशाली कला है। समारोह के दौरान प्रसिद्ध ढाडी जत्थों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से स्वर्गीय सीतल की रचनाओं का गायन किया।
कुलतार सिंह संधवां ने भाषा विभाग की सराहना करते हुए कहा कि ज्ञानी सोहन सिंह सीतल को याद करके भाषा विभाग ने पंजाबी मां का आशीर्वाद प्राप्त करने वाला कार्य किया है। उन्होंने कहा कि ज्ञानी जी अपनी कला के विभिन्न रूपों के माध्यम से पंजाब को हर क्षेत्र में खुशहाल बनाने की इच्छा व्यक्त करते रहे। उन्होंने कहा कि सीतल जी जैसी शख्सियतों की विद्वता और रचनाओं को साथ लेकर चलना हमारा दायित्व है। कुलतार सिंह संधवां ने कहा कि ढाडी कला वीरता की प्रतिनिधि कला है और समय-समय पर इतिहास को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। उन्होंने कहा कि हम धर्म, पहनावे, खान-पान और वर्ग के आधार पर बंटकर लड़ रहे हैं, जबकि ये चीजें हमारे देश की विविधता और खूबसूरती की प्रतीक हैं। स्पीकर ने कहा कि हमारी विरासत बहुत समृद्ध है और इसे संभालने के लिए भाषा विभाग जैसे संस्थानों को बढ़-चढ़कर योगदान देना चाहिए।
भाषा विभाग के निदेशक स. जसवंत सिंह ज़फ़र ने अपने स्वागत भाषण के दौरान कहा कि ज्ञानी सोहन सिंह सीतल की शख्सियत में ढाडी कला, इतिहास लेखन, गीत लेखन, उपन्यास लेखन आदि के अनेक रूप शामिल थे। उनकी विशेषता यह थी कि जब वे ढाडी के रूप में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते थे तो यह महसूस नहीं होता था कि वे सूक्ष्म दृष्टि वाले उपन्यासकार भी होंगे। वहीं, जब उनके उपन्यास पढ़ते हैं तो यह महसूस नहीं होता कि वे उच्च कोटि के ढाडी भी होंगे। वे दोनों ही क्षेत्रों में पारंगत थे। ऐसी प्रतिभा को याद करना और नई पीढ़ी को उनसे परिचित करवाना हमारा कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि ढाडी और कविशरी कला ने मध्यकाल से ही पंजाबी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। निदेशक ज़फ़र ने कहा कि ढाडी कला की दोनों धार्मिक और विरासती परंपराओं का अपना-अपना रंग और महत्व है। इनका पंजाबी क्षेत्र के धार्मिक एवं सांस्कृतिक विकास में भरपूर योगदान रहा है।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता श्री देश राज छाजली ने ज्ञानी सोहन सिंह सीतल के व्यक्तित्व और कला पर प्रकाश डाला तथा पंजाब के ढाडी संगीत के आरंभ और विकास के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ढाडी कला संगीत की एक शुद्ध परंपरा है, जो गुरु काल से पहले से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि श्री गुरु अर्जन देव जी की शहादत के बाद पंजाब की ढाडी कला में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया, जिसके साथ इसमें वीर रस का रंग शामिल हुआ। उन्होंने कहा कि ढाडी कला लोगों की सोच को शुद्ध, ऊंचा और तेज बनाती है।
इसके बाद श्री देश राज छाजली तथा उनके साथियों घरिंदर सिंह वड़ैच, हरबाग सिंह वड़ैच और हंस राज छाजली ने ‘अंग-संग रही बाजां वालियां’ का गायन कर ढाडी गायन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने गदर लहर और पंजाब की वर्तमान स्थिति पर प्रस्तुति देकर समारोह को शानदार शुरुआत दी। ढाडी रछपाल सिंह पमाल के जत्थे ने गुरु अर्जन साहिब की एक पौड़ी के गायन के बाद सीतल की झोक छंद की रचना ‘कह दे एक वारी पुत्त नहीं दशमेश दा’ और ‘अपना पंजाब होवे, हाथ विच किताब होवे’ का गायन कर समारोह को नए दौर में पहुंचा दिया।
नवजोत सिंह मंडेर, जसकंवर सिंह मंडेर और नवकंवर सिंह मंडेर के जत्थे ने ज्ञानी सीतल की रचनाओं ‘पंजाब दीए मुटियारे नी’, ‘मेरी हंझूआं में खुर गई जवानी’ सहित अपना चर्चित गीत ‘गानी’ और ‘कलैरिया मोरा वे’ गाकर समारोह को शिखर पर पहुंचा दिया।
इस अवसर पर भाषा विभाग की पिछले वर्ष की गतिविधियों और उपलब्धियों पर आधारित पुस्तक ‘साल दे सफे’ भी लोक-अर्पित की गई। मेहमानों और ढाडी जत्थों को विभागीय शॉल तथा पुस्तकों के सेट देकर सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर भूपिंदरा स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के उपकुलपति डॉ. पुष्पिंदर सिंह गिल, स. कंवलजीत सिंह ढींडसा, पद्मश्री प्राण सभरवाल, प्रोफेसर कृपाल कजाक, इंजीनियर ज्योतिंदर सिंह, उत्तरी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के सहायक निदेशक रविंदर शर्मा, एसडीएम गुरदेव सिंह, पूर्व उपनिदेशक सतनाम सिंह, शायर अवतारजीत सिंह, डॉ. जगदीश पापड़ा, प्रीतम सिंह जौहल, रंगकर्मी जोगा सिंह और डॉ. पुष्पिंदर खोखर सहित बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे।
फोटो कैप्शन: स्पीकर स. कुलतार सिंह संधवां और भाषा विभाग के निदेशक स. जसवंत सिंह ज़फ़र विभागीय गतिविधियों पर आधारित पुस्तक ‘एक साल दे सफे’ जारी करते हुए। साथ में डॉ. पुष्पिंदर सिंह गिल, कंवलजीत सिंह ढींडसा और अन्य।
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