*पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी को मिल सकती है पंजाब प्रदेश कांग्रेस की कमान*

Jun28,2026 | Rajender Singh Jadon | Chandigarh


           राजेंद्र सिंह जादौन
चंडीगढ़, 28जून। पंजाब में कांग्रेस एक बार फिर दलित नेतृत्व के सहारे विधानसभा चुनाव में उतर सकती है। इस रणनीति के तहत प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर से सांसद चरणजीत चन्नी पंजाब प्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष बन सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने  चन्नी के नाम पर सहमति दे दी है। चन्नी को कमान सौंपने से पहले कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने मौजूदा प्रधान अमरिंदर राजा वड़िंग और सांसद सुखजिंदर रंधावा को विश्वास में लिया हैं।
     कांग्रेस पूर्व सांसद विजयइंदर सिंगला को कार्यवाहक अध्यक्ष बना रही है, ताकि दलित अध्यक्ष के साथ हिंदू कार्यवाहक अध्यक्ष लगाकर जातीय गणित साधा जा सके। वहीं जट्‌टसिख इससे नाराज न हों, इसलिए कांग्रेस विधायक दल के नेता और विधानसभा में नेता विपक्ष प्रताप सिंह बाजवा अपने पद पर बने रहेंगे। राजा वड़िंग और सुखजिंदर रंधावा को 2027 के चुनाव में अहम कमेटियों की बागडोर दी जाएगी। हालांकि यह फॉर्मूला नया नहीं है, क्योंकि कांग्रेस 2022 में भी चन्नी को सीएम चेहरा बनाकर लड़ी थी लेकिन तब कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जट्‌टसिख समुदाय से नवजोत सिद्धू थे। कांग्रेस इस चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई। इसकी बड़ी वजह सीएम चेहरा न बनाए जाने से नाराज होकर सिद्धू ने पार्टी प्रधान होते हुए भी  प्रचार नही किया था।
    पंजाब में इस समय सभी राजनीतिक दलों में ताकतवर पदों पर जट्‌ट सिख नेता हैं। आम आदमी पार्टी  सत्ता में है तो सरकार की कमान जट्‌ट सिख भगवंत मान के पास है। सरकार में नंबर दो पर दलित नेता हरपाल सिंह चीमा हैं। जबकि, पार्टी प्रधान अमन अरोड़ा हैं। भाजपा में केवल सिंह ढिल्लों पार्टी अध्यक्ष हैं और वह भी जट्‌ट सिख नेता हैं। अकाली दल में भी सुखबीर बादल प्रमुख हैं और वह भी जट्ट सिख नेता हैं। अभी कांग्रेस की कमान राजा वडिंग के हाथ में है तो वह भी उसी समुदाय से हैं। ऐसे में कांग्रेस तीनों दलों से अलग रणनीति बनाकर चलने की कोशिश में है।
 पंजाब में देश की सबसे बड़ी दलित आबादी (लगभग 32फीसदी) है। चन्नी के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यही है कि वह इस विशाल वोट बैंक के सबसे बड़े और सर्वमान्य सिख-दलित चेहरे हैं। बतौर सीएम चन्नी की आम आदमी वाली छवि बेहद लोकप्रिय रही थी। पूर्व सीएम होना और वर्तमान में जालंधर से सांसद होना उनके दावे को सबसे मजबूत बनाता है। हाईकमान को उम्मीद है कि चन्नी के आने से आप के पाले में गया पारंपरिक दलित और गरीब वोटर वापस कांग्रेस की तरफ लौट सकता है। पंजाब में करीब 25 से 26फीसदी शहरी और सामान्य हिंदू मतदाता हैं, जो लुधियाना, अमृतसर, जालंधर और पटियाला जैसे बड़े शहरों की सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। विजयइंदर सिंगला को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस शहरी और हिंदू मतदाताओं को संतुष्ट करवाएगी।
 पंजाब कांग्रेस के दो सबसे आक्रामक और मजबूत जट्ट सिख चेहरों सुखजिंदर सिंह रंधावा और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को भी पार्टी प्रमुख पदों पर रखेगी, ताकि चुनाव में जट्‌ट सिख नाराज न हों। पंजाब में जट्ट सिखों के 20 से 21 प्रतिशत वोट हैं। ऐसे में उन्हें चुनावी कमेटियों की कमान दी जाएगी। बेबाक और संगठन पर मजबूत पकड़ रखने वाले पूर्व उपमुख्यमंत्री व सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा को कैंपेन कमेटी या कोऑर्डिनेशन कमेटी का चेयरमैन बनाया जा सकता है। वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा सांसद राजा वड़िंग को मैनिफेस्टो कमेटी का प्रमुख बनाकर जोड़ा जा सकता है। वड़िंग के पास युवाओं को लामबंद करने का बेहतरीन अनुभव है, जिसका फायदा पार्टी चुनावी घोषणापत्र और जमीनी रैलियों को डिजाइन करने में उठाएगी।
हाल ही में चंडीगढ़ में कांग्रेस के अनुसूचित जाति  विभाग की बैठक में चरणजीत सिंह चन्नी का एक बयान सोशल मीडिया पर लीक हुआ, जिसने पार्टी के अंदर भूचाल ला दिया। चन्नी ने सीधे सांगठनिक पदों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि पंजाब में करीब 35 से 38फीसदी आबादी दलितों की है, तो हमें उचित प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिल रहा? पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष (राजा वड़िंग), सीएलपी लीडर (प्रताप सिंह बाजवा), महिला विंग की अध्यक्ष और जनरल सेक्रेटरी सभी उच्च जाति  से हैं। ऐसे में हमारे लोग कहां जाएं?"
चन्नी खुद को पंजाब में दलितों का सबसे बड़ा चेहरा बनाए रखना चाहते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में जालंधर (सुरक्षित सीट) से 1.75 लाख से अधिक वोटों से जीतकर उन्होंने अपनी ताकत साबित की है। वह हाईकमान पर दबाव बनाना चाहते हैं कि आगामी प्रदेश अध्यक्ष या किसी अन्य बड़े सांगठनिक पद पर किसी दलित चेहरे को जगह दी जाए। 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक 4 महीने पहले कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का पहला दलित मुख्यमंत्री बनाया था, लेकिन यह फॉर्मूला बुरी तरह फेल साबित हुआ। चन्नी को बहुत कम समय मिला था। इसके अलावा, नवजोत सिंह सिद्धू और अन्य जट्ट सिख नेताओं के साथ उनकी अंदरूनी कलह ने जनता में गलत संदेश दिया। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस महज 18 सीटों पर सिमट गई और खुद चन्नी अपनी दोनों विधानसभा सीटों से चुनाव हार गए। वर्ष 2022 की हार के बावजूद कांग्रेस इस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि पंजाब में दलित आबादी लगभग 32-35फीसदी है। कांग्रेस का मानना है कि 2022 में समय की कमी और गुटबाजी के कारण यह प्रयोग फेल हुआ था, लेकिन अगर समय रहते दलित वोट बैंक को एकजुट किया जाए, तो यह गेम-चेंजर हो सकता है। चन्नी की 2024 लोकसभा जीत ने हाईकमान को यह सोचने पर मजबूर किया है कि चन्नी का आधार अब भी जमीन पर मजबूत है। यदि कांग्रेस पंजाब में  दलित चेहरे (जैसे चन्नी) को प्रदेश अध्यक्ष बनाती है, तो वह राज्य के 4 प्रमुख राजनीतिक दलों में इकलौती ऐसी पार्टी होगी जिसका नेतृत्व दलित के हाथ में होगा। फिलहाल अकाली दल,भाजपा और आप में पारंपरिक रूप से जट्ट सिख नेतृत्व का बोलबाला  है। पंजाब का दोआबा क्षेत्र दलित बहुल है। दलित अध्यक्ष होने से आप और बसपा की तरफ गया यह बड़ा वोट बैंक वापस कांग्रेस से जुड़ सकता है। कांग्रेस खुद को समाज के वंचित तबके की हितैषी साबित कर भाजपा के हिंदू-सिख समीकरण और आप के सोशल इंजीनियरिंग की काट ढूंढ सकती है।

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