राजेंद्र सिंह जादौन
चंडीगढ़, 30 जुलाई। राज्यसभा में गुरुवार को दक्षिण हरियाणा में पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट बेंच की मांग पर चर्चा हुईं।भाजपा सदस्य संजय भाटिया ने शून्यकाल में यह मुद्दा उठाया। भाटिया ने गुरुग्राम में हाईकोर्ट की सर्किट बेंच स्थापित करने की मांग की।
हरियाणा में दशकों से अलग हाईकोर्ट की मांग उठाई जाती रही है, लेकिन राजनीतिक कारणों से उसका स्थान हमेशा चंडीगढ़ ही प्रस्तावित किया जाता रहा है।ऐसे में गुरुग्राम में केवल हाईकोर्ट की बेंच स्थापित करने का प्रस्ताव अब दक्षिण हरियाणा के लिए व्यावहारिक विकल्प के रूप में सामने आ रहा है। भाटिया ने सदन में कहा कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट चंडीगढ़ में होने के कारण गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, पलवल, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ सहित दक्षिण हरियाणा के लाखों लोगों को हर सुनवाई के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। इससे मुकदमेबाजी की लागत बढ़ती है, समय नष्ट होता है और न्याय तक समयबद्ध पहुंच प्रभावित होती है।
भाटिया ने गुरुग्राम को देश का प्रमुख आईटी, कॉरपोरेट, स्टार्टअप और वित्तीय सेवाओं का केंद्र बताते हुए कहा कि यहां वाणिज्यिक विवाद, मध्यस्थता, श्रम विवाद, भूमि अधिग्रहण, दिवालियापन, कर और संवैधानिक मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए स्थानीय स्तर पर हाईकोर्ट की बेंच होने से उद्योग जगत, निवेशकों और आम नागरिकों को राहत मिलेगी। उन्होंने हाल ही में गुरुग्राम में शुरू हुए अत्याधुनिक 'टॉवर ऑफ जस्टिस' का भी उल्लेख किया।
उनका कहना था कि डिजिटल कोर्टरूम और ई-कोर्ट सुविधाओं से लैस यह न्यायिक परिसर सर्किट बेंच के संचालन के लिए उपयुक्त आधारभूत ढांचा उपलब्ध करा सकता है। भाटिया ने संविधान के अनुच्छेद 39A का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को समान न्याय उपलब्ध कराना राज्य का दायित्व है, जबकि अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा माना गया है। इसलिए न्यायिक संस्थाओं का विकेंद्रीकरण संवैधानिक आवश्यकता भी है। उन्होंने केंद्र सरकार से हरियाणा सरकार, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और संबंधित पक्षों के साथ मिलकर गुरुग्राम में सर्किट बेंच की व्यवहार्यता का अध्ययन शुरू करने का आग्रह किया।
दक्षिण हरियाणा लंबे समय से प्रदेश का सबसे तेज़ी से विकसित होने वाला औद्योगिक और शहरी क्षेत्र बन चुका है। गुरुग्राम और फरीदाबाद में हजारों बहुराष्ट्रीय कंपनियां, कॉरपोरेट कार्यालय, औद्योगिक इकाइयां और स्टार्टअप संचालित हैं। इनसे जुड़े कानूनी विवादों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके बावजूद हाईकोर्ट स्तर की सुनवाई के लिए चंडीगढ़ जाना पड़ता है। अधिवक्ताओं का भी लंबे समय से तर्क रहा है कि इससे न्याय की लागत बढ़ती है और मामलों के प्रभावी संचालन में कठिनाई आती है।
हरियाणा में अलग हाईकोर्ट की मांग नई नहीं है। राज्य गठन के बाद से समय-समय पर यह मुद्दा उठता रहा है। हालांकि प्रदेश के लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों का रुख यही रहा है कि यदि अलग हाईकोर्ट बने तो उसका मुख्यालय चंडीगढ़ में ही स्थापित किया जाए। इसके पीछे तर्क यह रहा कि चंडीगढ़ हरियाणा और पंजाब की संयुक्त राजधानी है तथा राजधानी पर हरियाणा के दावे को कमजोर होने से बचाने के लिए हाईकोर्ट का चंडीगढ़ में ही रहना जरूरी है।