देसी कपास से बना तिरंगा, पीएम मोदी ने किया स्वीकार प्राकृतिक खेती और नव-त्रिंजन की पहल को मिली राष्ट्रीय पहचान
Aug7,2026
| Manjit Singh Dhalla | Jaito
जैतो, 7 अगस्त (मनजीत सिंह ढल्ला)-राष्ट्रीय हाथकरघा दिवस के अवसर पर खेती विरासत मिशन, पंजाब के 20 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर उन्हें प्राकृतिक खेती से उगाई गई पारंपरिक देसी गैर-बीटी कपास से हाथ से काते सूत और हाथकरघे पर बुनी खादी से तैयार राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा भेंट किया। प्रधानमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों के साथ करीब आधे घंटे तक आत्मीय संवाद किया तथा महिला बुनकरों, प्राकृतिक किसानों और ग्रामीण कारीगरों के कार्य की सराहना की।
यह जानकारी खेती विरासत मिशन के मुख्य संचालक उमेंद्र दत्त ने शुक्रवार को जैतो में पत्रकारों को दी। उन्होंने बताया कि प्रतिनिधिमंडल में 10 बुनकर तथा 10 प्राकृतिक किसान, किसान प्रशिक्षक और कार्यकर्ता शामिल थे। प्रधानमंत्री ने प्राकृतिक खेती को समय की आवश्यकता बताते हुए प्रतिनिधिमंडल का उत्साह बढ़ाया और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
नव-त्रिंजन से खेत से करघे तक जुड़ी कड़ी
उमेंद्र दत्त ने बताया कि प्रधानमंत्री को नव-त्रिंजन की पूरी कार्यप्रणाली से अवगत कराया गया। नव-त्रिंजन केवल बुनकरी परियोजना नहीं, बल्कि प्राकृतिक खेती से तैयार देसी कपास को कताई और हाथकरघे से जोड़कर विकसित किया गया ‘फार्म-टू-फैब्रिक’ मॉडल है। इसके माध्यम से ग्रामीण महिलाओं और युवाओं को कौशल एवं रोजगार से जोड़ने तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि नव-त्रिंजन की निदेशक रूपसी गर्ग ने प्रधानमंत्री को इस पहल की पूरी यात्रा और कार्यप्रणाली की जानकारी दी। नव-त्रिंजन समिति के अध्यक्ष एवं प्राकृतिक किसान सुरिंदर पाल सिंह सियाग ने प्राकृतिक रूप से रंगीन देसी कपास के बीज, रुई और उससे तैयार हाथकरघा वस्त्र प्रधानमंत्री को दिखाए। गांव चैना की बुनकर रमनदीप कौर द्वारा हाथ से बुना खादी का खेस/शॉल भी प्रधानमंत्री को भेंट किया गया।
उमेंद्र दत्त ने कहा कि खेती विरासत मिशन पिछले करीब 15 वर्षों से प्राकृतिक खेती, देसी बीज संरक्षण, जैव-विविधता, देसी कपास, हाथकताई, हाथकरघा और ग्रामीण आजीविका के क्षेत्र में काम कर रहा है। प्रधानमंत्री के समक्ष इस पहल को प्रस्तुत करने का अवसर किसानों, महिला बुनकरों और ग्रामीण कारीगरों के सामूहिक प्रयास को मिली मह
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