कैंसर के कारणों के निवारण पर हाइकोर्ट ने याचिकाकर्ता से ही रिपोर्ट तलब कर ली
Apr21,2026
| Rajender Singh Jadon | Chandigarh
राजेंद्र सिंह जादौन
चंडीगढ़ ,21अप्रैल। देश में कैंसर पैदा करने वाले कारकों के निवारण को लेकर केंद्र सरकार के स्तर पर नीति का अभाव महसूस करते हुए पंजाब और हरियाणा हाइकोर्ट ने याचिकाकर्ता से निजी शोध पर आधारित रिपोर्ट तलब कर ली।
कैंसर कारक तत्वों के नियंत्रण को लेकर देश में नीति और कानून के अभाव पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई । करीब 13 वर्षों से लंबित एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने कहा कि मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है और अब केवल पुराने जवाबों को दोहराने से समाधान नहीं होगा। हाइकोर्ट ने याचिकाकर्ता को दो महीने के भीतर कारणों और समाधान पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए ।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता हेमंत गोस्वामी ने दलील दी कि कैंसर पैदा करने वाले 556 से अधिक तत्वों की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो चुकी है, लेकिन भारत में इन्हें नियंत्रित करने के लिए कोई स्पष्ट नीति या कानून मौजूद नहीं है।उन्होंने बताया कि देश में यह एक शून्य की स्थिति है। इस कारण हर साल लाखों लोगों की जान जोखिम में पड़ रही है। उनका दावा था कि यदि इन तत्वों को नियंत्रित किया जाए तो लगभग 5 लाख मौतें हर साल रोकी जा सकती हैं।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि केंद्र और राज्य सरकार इस मुद्दे पर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल रही हैं। पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रशासन का कहना है कि यह विषय केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि केंद्र का रुख इसके विपरीत है। अदालत के समक्ष यह भी सामने आया कि केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में दाखिल हलफनामा भी पुराने जवाब की पुनरावृत्ति मात्र है, जिससे मामले में कोई प्रगति नहीं हो पाई है।
सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने इस बात पर भी असंतोष जताया कि विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की रिपोर्ट्स तो पेश की गई हैं, लेकिन कोई समेकित नीति या ठोस कार्ययोजना सामने नहीं आई। राज्य सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे में भी स्पष्ट नहीं किया गया कि दिशा-निर्देशों का उल्लंघन होने पर क्या कार्रवाई होगी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने इस विषय पर व्यापक शोध किया है, इसलिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करें, जिसमें न केवल समस्या के कारण बल्कि उसके व्यावहारिक समाधान भी शामिल हों। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट में केंद्र और राज्य दोनों के अधिकार क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए सुझाव दिए जाएं।
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