पंजाब में शहरी निकाय चुनाव में घट गया मतदान प्रतिशत 9.59फीसदी की गिरावट से राजनीतिक दल चिंतित
May27,2026
| Jagrati Lahar Bureau | Chandigarh
राजेंद्र सिंह जादौन
चंडीगढ़, 27 मई । पंजाब में एक दिन पूर्व मंगलवार को शहरी निकाय चुनाव के लिए कराए गए मतदान में पिछले चुनावी के मुकाबले 9.59फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। अंतिम रूप से सामने आए मतदान के आंकड़ों के अनुसार शहरी व अर्द्ध शहरी क्षेत्रों में मतदान कम हुआ है और इससे सभी राजनीतिक दलों के नेता चिंता में आ गए।
आंकड़ों के अनुसार पिछले निकाय चुनावों में जहां 73.53 प्रतिशत मतदान हुआ था, वहीं इस बार 63.94फीसदी मतदान दर्ज किया गया। खासकर बड़े शहरों और नगर निगम क्षेत्रों में इस बार मतदान का प्रतिशत काफी कम रहा। पंजाब में कुल 12 नगर निगम, 76 नगर परिषद व 21 नगर पंचायतें हैं। नगर निगम, नगर काउंसिल व नगर पंचायत की 75 से 80 सीटें अर्बन व सेमी-अर्बन क्षेत्रों की हैं। इसीलिए सभी राजनीतिक दलों ने इन चुनावों में पूरी ताकत झोंक दी।
इस बार कुल मतदान में 9.59फीसदी की भारी गिरावट रही है। साल 2021 और 2026 के निकाय चुनावों की तुलना करें, तो इस बार वोटर्स का मिला-जुला रुख देखने को मिला है। साल 2021 के पंजाब निकाय चुनाव में कड़ाके की ठंड और किसान आंदोलन के साए के बीच रिकॉर्डतोड़ 73.53फीसदी मतदान हुआ था। उस समय बठिंडा, पठानकोट और अमृतसर जैसे अधिकांश निगम क्षेत्रों में मतदान 70फीसदी से अधिक रहा था। इसके उलट, साल 2026 के इन चुनावों में कुल 63.94फीसदी मतदान ही दर्ज किया गया है। इस तरह पिछले चुनाव की तुलना में इस बार वोटिंग प्रतिशत में करीब 9.59फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
चुनाव आयोग के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, बड़े शहरों की तुलना में छोटे कस्बों और गांवों से सटी नगर पंचायतों में लोगों ने भारी उत्साह के साथ लोकतंत्र के इस उत्सव में भाग लिया। नगर पंचायतों में सबसे अधिक 76.18फीसदी मतदान दर्ज किया गया।
सबसे खराब स्थिति 8 नगर निगम क्षेत्रों की रही, जहां सबसे कम 59.91फीसदी मतदान हुआ। यहां 10 लाख 71 हजार 403 रजिस्टर्ड मतदाताओं में से महज 6 लाख 41 हजार 930 वोटर ही पोलिंग बूथों तक पहुंचे। नगर कौंसिलों में मतदान प्रतिशत 65.06फीसदी रहा। संख्या के लिहाज से यहां सबसे अधिक मतदाता थे, जहां कुल 22 लाख 87 हजार 637 मतदाताओं में से 14 लाख 88 हजार 408 लोगों ने वोट डाले। ये चुनाव जमीनी स्तर पर राजनीतिक दलों के बीच साख की लड़ाई बन चुके थी। विपक्ष जमीन पर खोई पकड़ वापस पाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा था, तो सत्ताधारी दल शहरी गढ़ों को बचाने के लिए आक्रामक रुख अपनाए हुए था। उधर, भारतीय जनता पार्टी शहरी पार्टी का टैग छुड़ाने की कोशिश में दिखी।लोग अब इन स्थानीय चुनावों को उतनी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। वोटर्स को लगता है कि वे चाहे जिस पार्टी के उम्मीदवार को जिताएं, जीतने के बाद वह पार्षद या मेयर अंततः सत्ताधारी दल की झोली में ही चला जाता है। पूर्व में भी लुधियाना, अमृतसर और जालंधर जैसे बड़े नगर निगमों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। इसके बाद सत्ताधारी दल ने दूसरे दलों के पार्षदों को अपने साथ शामिल करके अपने मेयर बना लिए थे। साल 2024 के चार नगर निगम चुनावों में भी ऐसा ही खेल देखने को मिला, जिससे आम शहरी वोटर निराश हुआ और उसने पोलिंग बूथ से दूरी बना ली।मई के महीने में पड़ रही रिकॉर्डतोड़ भीषण गर्मी और लू को भी मतदान प्रतिशत गिरने का एक बड़ा कारण माना जा रहा है, जिसकी वजह से दोपहर के वक्त शहरों में लोग घरों से बाहर नहीं निकले।
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