सोशल मीडिया की खूबसूरती पर मत फिसलें, ऐसे हनी-ट्रैप में फंस रहे अफसर, पाकिस्तान ने चली अजीब चाल

Sep9,2026 | Ravinder Singh Dhillon | Khanna


खन्ना ,रविंद्र सिंह ढिल्लों

भारतीय खुफिया एजेंसियों की चिंता बढ़ाने वाला हनी-ट्रैप का एक नया तरीका सामने आया है. अधिकारियों के मुताबिक, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI संवेदनशील जानकारी रखने वाले अधिकारियों को निशाना बनाने के लिए प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों की मदद ले रही है. सोशल मीडिया पर पहले उनकी निजी कमजोरियों की पहचान की जाती है, फिर महीनों तक भरोसा जीतकर उन्हें कथित तौर पर संदिग्ध ऐप इंस्टॉल करने और संवेदनशील जानकारी साझा करने के लिए तैयार किया जाता है 
भारत में पिछले कुछ सालों में हनी-ट्रैप के मामले बढ़े हैं. चेतावनियों और सलाहों के बावजूद कई अधिकारी इन नेटवर्क का शिकार बन रहे हैं. पाकिस्तान की आईएसआई यह नेटवर्क चलाती है. एक अधिकारी ने बताया कि आईएसआई ने ऐसे अधिकारियों की पहचान करने के लिए कई मनोवैज्ञानिकों को काम पर रखा है जिनके पास संवेदनशील जानकारी होती है. मकसद ऐसे लोगों का अध्ययन करना, उनकी निजी समस्याओं को समझना और फिर उनसे जानकारी निकलवाना है

इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी ने कहा कि आईएसआई इस काम के लिए मनोवैज्ञानिकों को नियुक्त कर रही है और उन्हें टारगेट खोजने से पहले महिलाओं के नाम से सोशल मीडिया अकाउंट बनाने का निर्देश देती है. ये बहुत अच्छी तरह से प्रशिक्षित लोग होते हैं जो निजी समस्याओं वाले अधिकारियों को फंसाने में माहिर होते हैं. ये मनोवैज्ञानिक पहले सोशल मीडिया पर अधिकारियों की पहचान करते हैं और फिर उनके द्वारा पोस्ट किए गए संदेशों का गहराई से अध्ययन करते हैं.
अधिकारी ने कहा कि चूंकि वे प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक होते हैं, इसलिए वे आसानी से ऐसे अधिकारियों की मानसिकता को समझ लेते हैं. एक बार पहचान हो जाने के बाद, आईएसआई द्वारा नियुक्त ये मनोवैज्ञानिक उन अधिकारियों से बातचीत शुरू करते हैं और उनके प्रति बहुत सहानुभूति दिखाते हैं. वे इन लोगों की कमजोरियों का पता लगाने में महीनों बिताते हैं. इन अधिकारियों का भरोसा जीतने में उन्हें लगभग दो से तीन महीने लगते हैं. जब भरोसा बन जाता है, तो इन लोगों को अपने सिस्टम पर कुछ एप्लिकेशन इंस्टॉल करने के लिए कहा जाता है. इनमें से ज्यादातर एप्लिकेशन में चुपके से काम करने वाले स्पाइवेयर और मैलवेयर होते हैं, जो चीन में बने होते हैं.

अधिकारियों का कहना है कि हनी-ट्रैप नेटवर्क अब पैसे और डराने-धमकाने जैसे तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. इसके बजाय कमजोरियों का फायदा उठाया जाता है और करीबीपन और आकर्षण का इस्तेमाल करके संवेदनशील जानकारी रखने वाले अधिकारियों को फंसाया जाता है. मनोवैज्ञानिक इन तरीकों का सबसे बेहतर इस्तेमाल करते हैं. फंसने वाले व्यक्ति को पता भी नहीं चलता और वह डिजिटल कम्युनिकेशन चैनलों के ज़रिए संवेदनशील जानकारी दे बैठता है.
हाल के मामलों में यह पाया गया है कि अधिकारियों की निजी समस्याओं का फायदा उठाना आईएसआई के लिए कारगर रहा है. ये अधिकारी कमजोर स्थिति में होते हैं और अपनी निराशा निकालने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं. चूंकि यह तरीका आईएसआई के लिए अच्छा काम कर रहा है, इसलिए पाकिस्तान में मनोवैज्ञानिकों की मांग बढ़ गई है. हाल ही में हनी-ट्रैप नेटवर्क में मनोवैज्ञानिकों को शामिल करने के मामलों में हुई बढ़ोतरी ने भारतीय एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है.

एक अधिकारी ने बताया कि यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि नियमित रूप से एडवाइजरी जारी किए जाने के बावजूद कई अधिकारी इस जाल में फंसते जा रहे हैं और अपने सिस्टम में डेटा लीक करने वाला या मैलवेयर साफ्टवेयर तक इंस्टॉल कर लेते हैं.

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