- Date: 16 Jan, 2021 Saturday
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किसानों ने तीन कृषि कानूनों की कॉपी जलाकर लोहड़ी का पर्व मनाया

Jan13,2021 | Gautam Jalandhari | New Delhi/ludhiana

किसानों के दिल्ली मोर्चे को आज 50 दिन हो गए है। केंद्र सरकार द्वारा लाये गए तीन कृषि कानूनों का विरोध देशव्यापी होता जा रहा है। किसान तीनों कानूनों को वापस कराने और MSP को कानूनी अधिकार की मांग पर अडिग है। सरकार और असामाजिक तत्वों के अनेक प्रयासों के बावजूद हम यह बताना चाहते है कि इन मांगों के बिना किसान अपनी हड़ताल वापस नहीं लेंगे। दिल्ली की सभी सीमाओं समेत देश-दुनिया में तीन कृषि कानूनों की कॉपी जलाकर लोहड़ी का पर्व मनाया जा रहा है। सिंघु बॉर्डर पर सभी किसान नेताओ ने एक साथ इस कार्यक्रम में भाग लिया और दुल्ला भट्टी को याद करते हुए इस सरकार को चुनौती दी। जयपुर दिल्ली हाइवे पर किसानों के लगे धरनों को पुलिस लगातार परेशान कर रही है। अपने हको के लिए शांतिपूर्वक प्रदर्शन करना किसानों का मौलिक अधिकार है। संयुक्त किसान मोर्चा इस तरह की गतिविधियों पर पुलिस को किसानों के धरने पर परस्पर सहयोग की अपील करता है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान यह कहा गया कि "औरतें इस हड़ताल में क्यों है? औरतों और बुजुर्गों को इस हड़ताल में क्यों रखा गया है? उन्हें घर जाने को कहना चाहिए". सयुंक्त किसान मोर्चा इस तरह के कथनों की निंदा करता है। कृषि में महिलाओं का योगदान अतुलनीय है और यह आंदोलन महिलाओं का भी आंदोलन है। इस तरह से महिलाओं की अपनी एजेंसी पर सवाल उठना बहुत ही शर्मनाक है। हम इसकी सख्त निंदा करते है। मध्यप्रदेश में भिंड और गुना समेत कई जगहों पर किसान संघर्षरत हैं। महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक में भी किसान लगातार प्रदर्शन कर रहे है। बिहार, जो कि कृषि सेक्टर के खुले बाजार के परिणाम पहले ही भोग चुका हैं, के किसान शुरू से ही इन कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे है। ये बात सरकार की असंवेदनशीलता का प्रतीक है कि दिल्ली के बोर्डर्स व देशभर में लगे किसानों के धरनों पर लगातार किसानों की मौत हो रही है। सरकार का इस पर ध्यान न देना निःसंदेह उनके अमानवीय चेहरे को बेनकाब करता है। साथ ही, शहीद हो रहे किसानों की खबरे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक नहीं पहुच रही है। किसान आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने तथ्यों को संकलित किया। अब यह आंकड़ा 120 तक पहुंच गया है। यह महज संख्या नहीं है। इन सभी जिंदगियों का हमसे बिछुड़ना निःसंदेह हम सबका नुकसान है पर सरकार अभी भी इतनी असंवेदनशील है कि इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही है।

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