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आखिर देश का किसान क्यों जाना चाहता है छुट्टी पर ....

क्या एक जून से दस जून तक देश का किसान छुट्टी पर है...

May24,2018 | RAKESH SHARMA | KURUKASHETRA

कुरूक्षेत्र राकेश शर्मा --- देश का किसान ओर उस पर हो रही राजनीति थमने की बजह बड़ती ही जा रही है चुनावों के दौरान जो वायदे किसानों से किये जाते उन वायदो पर खरा ना उतर पाने के कारण किसान आज सडक़ो पर उतर कर धरने, प्रदर्शन, चक्का जाम , पुलिस की लाठी ओर गोली खाने को मजबुर हो गया है किसानों की बात तो सभी करते है लेकिन उनके समस्या का समाधान कोई भी सरकार हो चाहे वो केन्द्र की सरकार हो या फिर राज्य की सरकार हो? वैसे तो भारत देश कृषि प्रधान है ओर किसानों को धरती पुत्र की सज्ञां भी दी गई है लेकिन किसानों की दुर्दशा दिन प्रतिदिन बिगड़ रही है जिसके कारण उनको बार बार सडक़ो पर अपने दर्द को सरकार के कानों तक पहुचाने का काम करते रहे है लेकिन कोई भी सरकार किसानों की समस्या का सामधान करने में कारगर नही हो पाई है किसान अन्दोलन कई सालों से चल रहे है ओर सरकार ने किसानों की समस्या का कोई जटिल समाधान नही निकालती तब तक शायद देश का किसान खुशहाल नही हो सकता। लेकिन अब किसान सगंठनों ने धरने प्रदर्शन ओर जेल भरो अन्दोलन जैसे कार्य का छोड़ कर एक जून से लेकर दस जून तक गॉव बदं करने का आह्वन किया है जिसके तहत गांव का कोई भी किसान शहरो में दुध, सब्जियां व फल इत्यादि नही जाने दी जाएंगी तथा न शहर से कोई वस्तु इन दस दिनों के भीतर गांव में आएगी। किसान संगठनों ने सरकार को चेताते हुए कहा कि यदि इन दस दिनों में भी उनकी मांग नही मानी तो वे अन्दोलन को आगे भी बढ़ाने से कोई फरहैज नही करेगें। यदि ऐसा होता है ओर किसानों का अन्दोलन जिसको गॉव बंद का नाम दिया गया है वो कामयाब हो जाता है तो जरा सोचिए शहरों में खाद्य पदार्थो की मांग बढ जाएगी या फिर वह महंगी हो जाएगी शहरों मे दुध की समस्या से भी दो चार होना पड़ेगा। शहर को इस समस्या से झुझंने के लिए तैयार होना पड़ेगा क्योंकि अब की बार किसान भी जून की छुट्टी पर जाने को तैयार हो गया है ओर इसकी रूपरेखा भी तैयार कर ली गई है जब इस विषय में भारतीय किसान युनियन प्रदेशाध्यक्ष गुरनाम सिंह चढुनी से बातचीत कि गई तो उन्होने बताया कि जब भी चुनाव होता है तो राजनीतिक पार्टीयां किसानों को लुभावने वायदे करके उनकी वोट हथियाने का काम कर रही है लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हो जाता ओर पार्टीयां सत्ता पर आसीन होती है तो वह किसानों की समस्या को किनारे करने में कोई भी फरहैज नही करती जिसके कारण किसान परेशान ओर हताश है किसान अपने जीवन का गुजारा कैसे चला रहा है ये किसी से नही छिपा है किसान कर्ज के बोझ में दबता जा रहा है वह इस समस्या से नही निकल पा रहा है। लेकिन अब की किसान की आवाज को उठाने के लिए इस अन्दोलन मे ना कही धरना है ना की प्रदर्शन ओर ना ही चक्का जाम करने की करने की तैयारी है अब की केवल गॉव बंद करके ही किसान अपना आक्रोश सरकार के खिलाफ निकालने का काम करेगा ओर बताने का कार्य करेगा कि यदि किसान अपना सामान शहर में बेचे तो क्या हो सकता है उसके परिणाम क्या हो सकते जिसका खामियाजा अब सभी को भुगतना पड़ेगा। उन्होने बताया कि इस राष्ट्रीय किसान महांसघ व अन्य किसान संगठन कार्य कर रहे है ओर उनको उम्मीद ओर पूरा विश्वास है कि इस अन्दोलन को सफल बनाने के लिए देश का किसान अपनी अहम भुमिका निभाने को तैयार है... किसानों की मांग जो सरकार ओर किसानों उठाते हुए आ रहे है---- 1. स्वामी नाथन रिपोर्ट लागू करना $... अन्न की आपुर्ति को भरोसेमंद बनाने ओर किसानों की आर्थिक हालात को बेहतर करने इन दो मकसदो को लेकर 2004 में केन्द्र सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नैशनल कमीशन ऑन फार्मर्स का गठन किया। इस आयोग ने अपनी पांच रिपोर्ट सौपी। अन्तिम पांचवी रिपोर्ट 4 अक्तुबर 2006 में सौपी गयी लेकिन इस रिपोर्ट में जो सिफारशे है उन्हें आज तक लागू नही किया जा सका। 2.किसान कर्जदार मुक्त हो... देश का किसान कर्जदार होने के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे है ओर लेकिन कर्ज ना चुकाने की एवज में मौत को गले लगा लेना ये समस्या का समाधान नही है लेकिन उनके पास इसके सिवा अंत में उनके पास कोई रास्ता भी नही बचता देश के प्रत्येक राज्य में यह मांग किसान संगठन उठाते रहे है कि उनको कर्ज से मुुक्त किया जाए । किसानों की आय सुनिश्चित कि जाए... देश का किसान धरती का सीना चीर कर जो अनाज, फल, सब्जियां उगाता है उन पर लागत तो बढ रही है लेकिन उसकी लागत का सही मुल्य नही मिल पाने से भी किसानों की सबसे बडी समस्या के रूप में देखा जाता रहा है किसानों की मांग है कि उनकी आय को सुनिश्चित किया जाए कि ताकि उनकी फसल के दाम एक समान रहे। किसानों की मांगे तो कई है लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि यदि हमारी यह मांग सरकार द्वारा मान ली जाती है ओर उनको लागु किया जाता है तो कही ना किसान को एक सहारा मिल जाएगा ओर शायद किसानों की दशा सुधारने में कारगार हो...

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